
हम तो समझे थे इक हम ही हुए हैं छलनी
नज़र जाती है जहाँ, चाक ज़िगर बैठे हैं |
तुम तो रखते हो जुबां, फिर भी नसीब वाले हो
लोग ऐसे भी हैं जो लब को सिले बैठे हैं |
बात कुछ है तो ज़रूर, इतना तो तय है लेकिन
हम भी जाने नहीं हम किससे खफा बैठे हैं |
अपने हर दर्द को कागज़ से ही कह देंगे हम
दर्द पीने को यहाँ, कौन मेरे बैठे हैं |
कोई आएगा कभी शब ए तन्हाई में
बस इसी आस से हम रतजगे पे बैठे हैं |
जीत पाते नहीं , और हार तो सकते नहीं हम
जब तलक साँस है, तलवार लिए बैठे हैं |
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