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Tuesday, September 20, 2011


जहाँ को थी न ये उम्मीद की हम कुछ कर दिखायेंगे
कोई पूछे हमें तो हम तुम्हारा नाम लायेंगे,
करवटों में कटी रातें और हमने बस गिने तारे
खबर क्या थी की टूटते तारों से दुनिया मांग लायेंगे |

राह में चलते जुदा वो कब हुए, मालूम क्या
हम तो हर मोड़ पे बेफिक्र निकले कि वो साथ आएंगे
वफ़ा के जज्बे हैं अहसास, कोई दावे नहीं दिलबर
साथ जो जी नहीं सकते वो क्या मर के दिखायेंगे |

ज़िन्दगी गुमनामियों में थी कटी अपनी
न जाना मर के इतना नाम पाएंगे
बंदापरवर यकीं करिए तुरंत हो जाते हम रुखसत
पता होता अगर कि आप मेरे मकबरे बनायेंगे |

लोग उस सीप को बेकार ही चूमें जो दे मोती
ये काम है उस बूद का जो मिल गयी उससे
इनायत आपकी कि हमसे कर लेते हैं दो बात
वरना हम थे किस काबिल, ग़ज़ल हम क्या बनायेंगे |

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