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Monday, September 19, 2011

माँ


मैं सोचता हूँ कभी
इस खरीद फरोख्त की दुनिया में
कैसे एक शक्सियत सदियों से नहीं बदली
माँ तुम बिलकुल नहीं बदली |

याद है मुझे युगों पहले
मेरी एक हलकी सी आह पर
किस कदर तुम्हारा मन घबरा जाता,
फिर खुद से बेपरवाह हो
सौ जान से तुम्हारा मुझ पे निछावर होना
अपने आँचल में भर कर
मानो कायनात के हर कुफ्र से महफूज़ कर लेना |

आज भी मेरे माथे के एक शिकन से ही
तुम्हारे चेहरे की लकीरों में कुछ और इजाफा हो जाता है
तुम शायद चाहती हो फिर से मुझे बाँहों में भर लो
मग मेरी ओर देख कुछ सहम सी जाती हो
कहना चाहती हो बहुत कुछ मगर ठहर जाती हो
और बामुश्किल बुदबुदाती हो '' क्या हुआ बेटा ''
मैं एक बेरुख़ा सा कुछ नहीं तुम्हारी ओर फेंक देता हूँ
और तुम फिर से ख़ामोशी ओढ़ लेती हो |

जाने किस तरह तुम
मेरे सारे शौक मेरी पसंद याद रख लेती हो,
जब की देखा है मैंने तुम तो अक्सर खुद को भी भूल जाती हो;
कभी कभी सोचता हूँ,मैं भी जानूंगा तुम्हें
तुम्हारी पसंद नापसंद , ख़ुशी नाखुशी
रंगों में, खाने में , पहनने में;
और बातें करूँगा तुमसे ढेरों
तितलियों पर, फूलों पर , खुशबुओं पर
पर कभी जब पूछता हूँ तुमसे बहुत इसरार से
तो तुम बस एक, बहुत कोशिशों से लायी
फीकी मुस्कान भर देती हो
जो जल्द ही ठंडी आह में तब्दील हो जाती है
और तुम्हें ढूँढने की मेरी साड़ी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं |

मैंने देखा है कई बार अकेले में
तुम कुछ गुनगुनाती हो
पता नहीं क्या?
पर कुछ मीठा सा, तुमसा
और तुम्हारा गीत धीरे धीरे हवा में फ़ैल कर
एक अजीब सी उदासी भर देता है
जो मेरी रूह में घुल जाती है
और जैसे ही तुम पाती हो, मैं देख रहा हूँ तुमको
तुम बारिश में भीगे परिंदे की मानिंद
खुद को समेत लेती हो
फिर से गुम हो जाती हो |

माँ कभी जब मैं बहुत खुश होता हूँ
दौड़ता आकर तुम्हें बाँहों में भर लेता हूँ
तो देखा है मैंने
किस तरह तुम्हारी आँखों की पुतलियाँ फ़ैल जाती हैं
तुम्हारे चेहरे की झुर्रियां गायब सी हो जाती हैं
बालों की चांदी भी घट जाती है
मेरे माथे को तुम प्यार से चूम लेती हो
और देखते ही देखते तुम वही
युगों सदियों पुरानी माँ बन जाती हो
माँ तुम बिलकुल नहीं बदली,
सच बिलकुल नहीं बदली |

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