
चिलचिलाती धूप भरी ज़िन्दगी की राहों पर
चलते नंगे पैर जब मुश्किल लगे तुमको सफ़र,
उदासी की गहरी धुंध छा रही हो रूह पर
या अँधेरी रात की दिखती न हो कोई सहर,
मंजिलों की राह तकते बुझने को हो तेरी नज़र
पाँव के छाले थकें और ख़त्म न होए डगर,
ज़वाब न दे ज़िन्दगी जब किसी सवाल पर
घेर ले कश्ती तेरी जब कोई गहरा भँवर,
चेहरों की भीड़ में कोई अपना न पाओ अगर
हौंसला हो टूटने को लड़ते हुए जीवन समर,
मोड़ हो कोई भी वो याद रखना तुम मगर
फैली हुई तेरे लिए हैं, दो बाँहें हर प्रहर |
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