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Tuesday, September 20, 2011


चिलचिलाती धूप भरी ज़िन्दगी की राहों पर
चलते नंगे पैर जब मुश्किल लगे तुमको सफ़र,
उदासी की गहरी धुंध छा रही हो रूह पर
या अँधेरी रात की दिखती न हो कोई सहर,
मंजिलों की राह तकते बुझने को हो तेरी नज़र
पाँव के छाले थकें और ख़त्म न होए डगर,
ज़वाब न दे ज़िन्दगी जब किसी सवाल पर
घेर ले कश्ती तेरी जब कोई गहरा भँवर,
चेहरों की भीड़ में कोई अपना न पाओ अगर
हौंसला हो टूटने को लड़ते हुए जीवन समर,
मोड़ हो कोई भी वो याद रखना तुम मगर
फैली हुई तेरे लिए हैं, दो बाँहें हर प्रहर |

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