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Tuesday, September 20, 2011

दिलज़ले




बेकद्री की हद कर दी काहिल ज़माने ने
सितारे जब दिए रब ने कहा गर्दिश में हैं सारे |
'सिफ़र' तू ग़म न कर तकदीर पे उस बेमुरव्वत की
की जिसकी लाय्कत जितनी उसे उतना ही मिलता है |
तो क्या बरस जाए अगर सावन भी सेहरा में
वहां कांटे ही उगते हैं कभी गुलशन न खिलता है |
जब पानी में था सूरज किसी ने इक नज़र न दी
सहर से दोपहर हो जाए तभी आँखों में चुभता है |
ज़र्रा भी हवाओं में बड़ी परवाज़ भरता है
ज़रा तूफाँ थमें तो क़दमों में ही पिसता है |
बड़ा नादाँ था 'सिफ़र' भी, वफ़ा भी पेश की किसको
वो महबूब तो गाफिल अदाओं पे ही मरता है |

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