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Tuesday, September 20, 2011


है आपका हर फैसला मंजूर दिलो जान से
पर एक गुज़ारिश नाचीज़ भी करना चाहे सरकार से
बेरुखी तो आपकी फिर भी सह लेंगे हम सनम
पर दोस्ती ये आपकी रंजिश न करा दे जहान से |

है सैर का ही शौक, तो हुज़ूर घूम आइये बाज़ार में
रस्तों में रौनक हो जाए, जो पड़े हैं वीरान से
पर ये सितम तो बेजा है कि जायेंगे मज़ार पे
मुर्दों में हसरतें जाग उठी, सब सोते थे आराम से |

जब लाते हैं तशरीफ़ आप, तब होते हैं कुछ जल्दी में
जब जाते हैं तो मेहरबां, करते हैं याद फिर फुर्सत से
शुमार आपका अपनों में कर भी लें चलिए मगर
कदम आलीजां के मेरे घर पड़ते हैं मेहमान से |

बड़ी थी बेकरारी मिलने कि हमको भी अपने यार से
सोचा नज़रों को भर लेंगे हम उनके दीदार से
सेहरा, दरिया सब पार किये तब जा के पहुंचे उनके दर
वो देख कर यूँ फरमाए 'कहिये आये थे किस काम से' |

वफायें हमने की बेहद, ज़फायें आपने इफरात से
बस अब और न लें इम्तिहान, सब्र के खाकसार के
रुसवाइयों का डर हमें न दिखलाइये बन्दा परवर
आपकी दुआ से खादिम पहले ही हैं बदनाम से |

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